मंज़िल आ जाए

मंज़िल आ जाए

ऐ जज़्ब-ए-दिल गर मैं चाहूँ हर चीज़ मुक़ाबिल आ जाए,
मंज़िल के लिए दो गाम चलूँ और सामने मंज़िल आ जाए,

ऐ दिल की ख़लिश चल यूँ ही सही चलता तो हूँ उनकी महफ़िल में,
उस वक़्त मुझे चौंका देना जब रंग पे महफ़िल आ जाए,

ऐ रहबर-ए-कामिल चलने को तैयार तो हूँ पर याद रहे,
उस वक़्त मुझे भटका देना जब सामने मंज़िल आ जाए,

हाँ याद मुझे तुम कर लेना आवाज़ मुझे तुम दे लेना,
इस राहे-मोहब्बत में कोई दरपेश जो मुश्किल आ जाए,

इस जज़्ब-ए-ग़म के बारे में एक मशविरा तुमसे लेना है,
उस वक़्त मुझे क्या लाज़िम है जब तुम पे मेरा दिल आ जाए ?
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आता है जो तूफ़ाँ आने दो क़श्ती का ख़ुदा खुद हाफ़िज़ है,
मुश्किल तो नहीं इन मौज़ों में बहता हुआ साहिल आ जाये..!!!

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