मैं तेरे दीदार को तरसती हूँ

मैं तेरे दीदार को तरसती हूँ

तेरे करीब और तुझसे दूर होने के बाद,
जहां जहाँ साथ चले वो रास्ते ढूंढती हूँ,

अपने हाथो की लकीरों में रातों को अक्सर,
तेरे ही नाम-ओ-निशान ढूंढती हूँ,

लिखी ये किसने मोहब्बत-ऐ-जुदाई जिंदगी में,
ना जाने कब से मैं तेरे दीदार को तरसती हूँ,

जिंदगी की राहों में कुछ इस कदर खो गयी हूँ,
की खुद को ही भीली और खुद को ही ढूंढती हूँ…!!!

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