कुछ अपनी सुनाता हूँ|

अब ये न पूछना की,
ये अल्फ़ाज़ कहाँ से लाता हूँ,

कुछ चुराता हूँ दर्द दूसरों के,
कुछ अपनी सुनाता हूँ|

(354)

Share This Shayari With Your Friends