किस कदर चाहते थे

किस कदर चाहते थे, तुम्हे बता न सके,
चले गए जब मुझे छोड़कर, हम वापस भी बुला न सके,

उम्मीद थी कितनी आँखों में तुम्हारी,
आँख मिलाने का हौसला जुटा न सके,
ऐसा भी नही की चाहत में कोई कमी थी,
ऐसा भी नही की हिम्मत भी जमी सी थी,
बस इरादों को अपने डगमगा न सके,

कुछ काम थे जो दुनिया के करने थे,
कुछ ज़ख्म जो हरे थे वो भी भरने थे,
कभी कसम खा बैठे थे कुछ ख़ास करने की,
कुछ बातें थी ज़िन्दगी कम,उम्मीद ज़्यादा मरने की,
अपने ज़िद की इस कसौटी पर तुम्हे ला न सके..

किस कदर चाहते थे तुम्हे, कभी खुद से छुपा न सके…!!!

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