बस मेरा हमदम है और मैं हूँ

बस मेरा हमदम है और मैं हूँ

जाने क्योँ खाबों का मौसम है और मैं हूँ
जाने क्योँ यादों की शबनम है और मैं हूँ

यादें लायी हैं खुशियाँ भी आँसू भी
जाने क्योँ इक ऐसा संगम है और मैं हूँ

बरसे जो रंग इतने सारे रंगी हुये सब नजारे
लेकिन मेरा दिल कहीं भी लगता नही बिन तुम्हारे

तुमको बस तुमको दुल ढूँढे दिल माँगे
जाने क्योँ हर लमहा ये सितम है और मैं हूँ

ये वादी अब सो गयी है कोहरे में ही खो गयी है
सारी फिजाँ साँस रोके गुमसुम सी हो गयी है

सारी दुनिया में अब कोई नही जैसे
जाने क्योँ बस मेरा हमदम है और मैं हूँ

(889)

Share This Shayari With Your Friends